Indian Rupee Recover: भारतीय रुपये में पिछले कुछ दिनों से जारी रिकॉर्ड गिरावट के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बाजार में सख्ती से दखल देना शुरू कर दिया है। इस हस्तक्षेप का तत्काल असर देखने को मिला और 17 दिसंबर को शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 90.25 के स्तर पर पहुंच गया। रुपये में यह उछाल लगभग 0.7% की बढ़त दर्शाता है, जबकि इससे पहले यह 91.07 के स्तर पर कमजोर खुला था।
RBI का सक्रिय हस्तक्षेप
बाजार सूत्रों के अनुसार, इस मजबूती के पीछे विदेशी मुद्रा बाजार में सरकारी बैंकों की सक्रिय उपस्थिति है। रॉयटर्स के अनुसार, तीन व्यापारियों ने बताया कि सरकारी बैंक तेजी से डॉलर बेच रहे थे, जिसकी संभावना भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से निर्देश पर की जा रही थी। RBI का यह कदम रुपये में अत्यधिक अस्थिरता और तेज गिरावट को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया प्रतीत होता है।
पिछले दिनों रुपये की रिकॉर्ड गिरावट
RBI के इस हस्तक्षेप से पहले, भारतीय रुपया लगातार दबाव में था और लगातार नए रिकॉर्ड निचले स्तर को छू रहा था। 16 दिसंबर को रुपया 91.03 के अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया था, जो एक व्यापार सत्र में उसकी सबसे बड़ी गिरावटों में से एक थी। इस गिरावट का असर घरेलू शेयर बाजारों पर भी देखने को मिला, जहां सूचकांकों ने अपनी सारी बढ़त गंवा दी।
गिरावट के प्रमुख कारण
रुपये में इस लगातार कमजोरी के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं:
- पोर्टफोलियो निवेश का बहिर्वाह (Portfolio Outflow): विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय बाजारों से लगातार पैसा निकाल रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है और रुपये पर दबाव पड़ रहा है।
- अमेरिका-भारत व्यापार गतिरोध: अमेरिका और भारत के बीच चल रहे व्यापारिक मुद्दों और टैरिफ संबंधी तनाव ने निवेशक भावना को प्रभावित किया है। भारत एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था है जिसकी अमेरिका के साथ कोई स्वतंत्र व्यापार समझौता (FTA) नहीं हुआ है।
- वैश्विक डॉलर की मजबूती: वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर मजबूत बना हुआ है, जिससे अन्य उभरती बाजार मुद्राओं के साथ-साथ रुपये पर भी दबाव है।
एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा
इन कारकों के चलते, भारतीय रुपया वर्ष 2024 में एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है। इस साल अब तक, रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 6% गिर चुका है। यह गिरावट निर्यातकों के लिए तो फायदेमंद हो सकती है, लेकिन आयात की लागत बढ़ने से देश में मुद्रास्फीति (महंगाई) के दबाव का जोखिम भी बढ़ाती है।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए समय पर हस्तक्षेप किया गया है, जिससे तत्काल राहत मिली है। हालांकि, रुपये की दीर्घकालिक स्थिरता मौलिक कारकों पर निर्भर करेगी। विदेशी निवेशकों का भरोसा वापस लाना, व्यापारिक मोर्चे पर सकारात्मक विकास और वैश्विक आर्थिक स्थितियाँ रुपये के भविष्य की दिशा तय करेंगी। बाजार भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से रुपये के समर्थन में और कदमों पर नजर रखे हुए है।





